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Sunday, May 9, 2010

प्रेम पीड़ा


हृदय है आहत  दग्ध -निश्चल 
प्रेम में तुमने किया है छल
यद्यपि मैं नहीं करुँगी अब स्मरण
उन यादों को , पर न बिसारूँ वो क्षण
प्रण था तुम्हारा साथ रहोगे  आमरण
पर ये क्या तुमने बिखेर दिया मेरा कण-कण

निद्रा हुई शत्रु रात्रि बना काल
लगे समाप्त कर दूं ये व्यर्थ जीवन काल
न सूझे मुझे और कोई मार्ग
तप्ताहत हूँ दग्ध हो रही हूँ जैसे आग

बिखेरना ही था तो तुम मोती बिखेरते
देना ही था तो तुम संग-सुख ही देते
ये क्या पीड़ा दिया तुमने आजीवन का
जीवन बना अर्थ हीन श्वास सर्प-दंश सा

प्रेम-विरह है असहनीय ये ज्ञान न था
राह पे पड़े पत्थरों का भान न था
प्रेम मे मिलन सुख का ही आभास था मुझे
विरह-वेदना का तनिक भी अहसास न था मुझे

इस जीवन जंजाल को ढो रही हूँ मै
मानो पत्थर की मूरत हूँ जड़ हो गई हूँ मै
क्या यही है वास्तविकता सच्चे प्रेम का
नहीं ! ये तो एक पक्ष है प्रेमजीवन  का

दूसरा पक्ष भी है प्रेम का, बड़ा सुखदाई
आमरण प्रेम ,सहजीवन जिसमे खुशी है समाई
तभी तो सब निस्संग को त्याग ये सुख है अपनाते
आजीवन सुख देते और साथ निभाते

यह तो मरे भाग्य था जो यह  हो न सका
इस स्वर्गीय सुख से वंचित मन रो न सका
मन चाहे मैं प्रेम में तटस्थ हो जाऊं 
कर्म और भाग्य  के समन्वय पर ही निर्भर रह जाऊं 

3 comments:

  1. virah ki aag me jala diya aapne to...ye kavita ek ratn hai

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  2. विरह की पीडा की मार्मिक अभिव्यक्ति। शुभकामनायें

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