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Wednesday, September 22, 2010

मन बंजारा

मेरे इस रेगिस्तान मन में
 बूँद प्यार का गर टपक जाए
  रेत गीली हो जाय
   दिल का दामन भर जाय

    जन्मों से प्यासे इस मन को
     प्यार का जो सौगात मिला
      मन पंछी बन उड़ जाए
       रहे न जीवन से गिला

        जाने क्यों मन भटका जाय
         ढूंढे किसे ये मन बंजारा
          है आवारा बादल की तलाश
           पाकर मन कहे 'मै हारा'

             इतना प्यार उड़ेलूँ उसका ..
              आवारापन संभल जाए
               वो बूँद बन जाए बादल का
                और इस सूखे मन में टपक जाए

11 comments:

  1. इतना प्यार उड़ेलूँ उसका ..
    आवारापन संभल जाए
    वो बूँद बन जाए बादल का
    और इस सूखे मन में टपक जाए
    बहुत ही सुंदर पंक्तियां...
    http://veenakesur.blogspot.com/
    अगर वीणा के सुर पसंद आए तो फॉलो कर उत्साह बढ़ा सकती हैं

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  2. सही कहा, मन बंजारा है, इधर-उधर भागता रहता है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  3. आप की रचना 24 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

    ReplyDelete
  4. सुंदर अभिव्यक्ति ।

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर रचना.

    ReplyDelete
  6. भावपूर्ण अभिव्यक्ति .धन्यवाद

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  7. इतना प्यार उड़ेलूँ उसका ..
    आवारापन संभल जाए
    वो बूँद बन जाए बादल का
    और इस सूखे मन में टपक जाए
    बहुत ही सुंदर ...

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